छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता के साथ पूर्ण पेनेट्रेशन नहीं हुआ है और केवल जननांग रगड़ने की घटना हुई है, तो इसे बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार का प्रयास माना जाएगा, मेडिकल साक्ष्यों में हाइमन सुरक्षित पाए जाने के आधार पर कोर्ट ने दोषी की सजा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी.
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने कहा कि आरोपी की नीयत आपराधिक और स्पष्ट थी, लेकिन पेनेट्रेशन के ठोस प्रमाण न होने से यह अपराध धारा 376 के बजाय धारा 376/511 के अंतर्गत आएगा. घटना की पृष्ठभूमि मामला वर्ष 2004 का है.
अभियोजन के अनुसार,पीड़िता को उसके घर से जबरन खींचकर आरोपी अपने घर ले गया, वहां कपड़े उतारकर उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की गई, इतना ही नहीं, पीड़िता को कमरे में बंद कर हाथ-पैर बांध दिए गए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया, बाद में उसकी मां ने उसे छुड़ाया. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 342 के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष का कठोर कारावास सुनाया था.