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होली, गौरैया दिवस व नारी सशक्तिकरण पर केंद्रित संकेत साहित्य समिति की सरस काव्य गोष्ठी का हुआ साहित्यिक आयोजन

होली, गौरैया दिवस व नारी सशक्तिकरण पर केंद्रित इस काव्य गोष्ठी का आयोजन भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन कर के मुख्य आतिथ्य, लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज की अध्यक्षता एवं के.पी.सक्सेना 'दूसरे', शकुंतला तरार तथा नीलू मेघ के विशिष्ट आतिथ्य में किया गया।

संकेत साहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने अपने स्वागत उद्बोधन में संमिति की दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है जिसे साहित्यकार शब्दों के माध्यम से चित्रित करता है। डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि सुनाने वाले के भीतर सुनने का भी माद्दा होना चाहिए। सुनने और गुनने से प्रतिभा में निखार आता है। गिरीश पंकज ने कहा कि काव्य गोष्ठियाँ कार्यशाला होती हैं सृजनकर्ताओं के लिए। इसमें शामिल होने से नये सृजन को बल मिलता है।

होली, नारी सशक्तिकरण, गौरैया दिवस एवं सामयिक परिवेश पर केन्द्रित नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गईं कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-


सीता राधा दुर्गा लक्ष्मी, शारद माई गुण के खान। नार बिलासा सावित्री ले, बाढ़िस सब नारी के मान।।
नारी धीरज बीज रोप के, देवत हे सुग्घर संस्कार। नारी चंदा ला छू डारिस, देखत रहिगे ये संसार।।

मैं अपनी ख़ुशी के लिए जीती हूँ
ख़ुशियों का मंज़िल संवारना जानती हूँ
आज़ादी की मंज़िल बनाना जानती हूँ

मां, क्या इसी दुनिया को दिखाने के लिए किया था तुमने / जीवन और मृत्यु का संघर्ष / जहां पैदा होने से पहले ही, भावी मां को/ मौत की नींद, सुला दिया जाता है

हे माँ मेरा तुझे तुझे कोटि कोटि प्रणाम।
अजन्म से ही वात्सल्य -सिंचित कर दिया धाम ।।

क़लम कितनी भी मँहगी हो सकती है ,
पर शब्द से अधिक कीमती कतई नहीं ।
चाहे क़लम की तुलना शमशीर से कर लें,
पर शब्द घाव भी है, मरहम भी।

रंग-रंग- रंग- रंग / कान्हा दियो ऐसो रंग /
सांवरे का रंग चढ़ा / राधा- रानी भीगा अंग।
लाल पिला हरा नीला / रंगे है छैल छबीला,
माने न वो हरजाई

● मैं सरस्वती का ज्ञान पुंज, मैं लक्ष्मी का वरदान हूँ,
सुंदर इस नूतन युग में, संकल्पों की ऊंची उड़ान हूँ।

रंग लगाकर गुलाल मल गालों पर
प्यारे मोहन से निश्चल प्यार करेंगे /कब आओगे मोरे कान्हा फिर कब लाओगे पिचकारी में रंग भरकर।

बस नारा उछालने का काम रह गया है हुक्मरानों का, बेटी बचावो-बेटी पढ़ाओ बना जुमला इश्तेहार का।

सारे घर की रौनकें बहार बढ़ाती ये बेटियां, हिंदू की दिवाली मुस्लिम की ईद में मुस्काती ये बेटियां।।

नवयुग की नवचेतना प्रवाहिनी हो तुम,
अपने अधिकार की दीप्तियुक्ता नारी हो तुम। अब पराधीन नहीं स्वनिर्मित व्यक्तित्व की उद्घोषिका हो तुम।

मत भूलो उस शक्ति को, जो घर की नींव कहलाती है।
वो ‘ग्रहणी’ मौन रह के,
पूरे घर को महकाती है॥

नारी पत्नी, बहू, बेटी और माता है, नारी जग जननी है भाग्यविधाता है।
धैर्य, साहस और शक्ति का है अद्भुत संगम,
घर परिवार की खातिर तत्पर रहती है हरदम।

यह कोमल कवि हृदय भी है गर छेड़ोगे चिंगारी है l
नेह मिले तो शीश नवा दे, दुष्टों पर तेज कटारी है।

शादी का चुकाना पड़ेगा दाम पति जी।
मैं “अर्चना” और तुम हो मेरे “राम” पति जी।
बरतन भी सिंक में भरे, कपड़े अलग पड़े।
धो लो कि बहुत हो गया आराम पति जी।

नारी से नर शोभित हैं /सुन ले ये सकल जहान ।
नारी बिना अपूर्ण सभी सब जीव जगत भगवान।

ईद की खुशी क्या होती हैं दोस्त जान जाओगे / जब हामिद की तरह तुम भी / चिमटा खरीद कर लाओगे/ मैं भी ईद में ईदी लेकर आया हूँ/ अम्मी तेरे हाथ ना जले, चिमटा खरीद लाया हूँ।।

सीखना है उड़ना तो / फुदको तुम
रेंगने और / गिरते, सम्हलते /चलते हुए लड़खड़ाने के बाद /यह फुदकना ही है /
जो उड़ने के करीब है।

टुटहा छानी तरी बिराजे,
भगवती से मिलावत हंव।
छत्तीसगढ़हिन डोकरी दाई के किस्सा ल सुनावत हंव।।

माथे पर चिंता रूपी /पसीने की बूंदों के नन्हे नन्हे से कण/मिटटी में गिरता देख/
अपार सुख की अनुभूति से सराबोर/नए घर में रहने के सुख का /सपना संजोती/बस्तर की नारी

युद्ध की विभीषिका / लील जाएगी सारा कुछ/ मचेगा त्राहिमाम् / नही बचेगा कोई। न युद्ध थोपने वाले / और न ही युद्ध झेलने वाले।

तन पांचो में बट गया बटा न मन का भाग।
हर युग रोई द्रौपदी भले अलग थे राग।।

कविता का मतलब नहीं, शब्दों की भरमार । कुछ तो उसका मर्म हो कुछ तो हो आधार।। फैल गया है इनदिनों, जगह जगह ये रोग। सम्मानित होने लगे, दो कौड़ी के लोग ।।

मेरा रिश्ता गौरैया से / मेरे घर में उसका घर है / मेरे कमरे के कोने में / उसका घर मेरे ऊपर है

आँगन में तू आ गौरैया / फिर से गाना गा गौरैया/ आ ना, तेरे लिये रखा है / पानी औ दाना गौरैया / बिन तेरे जीवन ये कैसा/ सबको ये समझा गौरैया


कार्यक्रम के अंत में कार्यक्रम के संयोजक रामकुमार सोनी ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति संकेत साहित्य समिति की ओर से आभार व्यक्त किया।

Hariram Chaurasia

हरीराम चौरसिया, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में 34 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव है। वे देश के प्रतिष्ठित अखबार 'दैनिक जागरण' सहित अन्य कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस के साथ कार्य कर चुके हैं और निष्पक्ष एवं तथ्यपरक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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