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मुफ्त जमीं, महंगा इलाज : “फ्री के प्लॉट मगर गरीबों का उपचार नहीं”

कभी चिकित्सा के पेशे को भगवान के दूसरे रूप में मानवता की सेवा का पर्याय माना जाता था। लेकिन आज...

कभी चिकित्सा के पेशे को भगवान के दूसरे रूप में मानवता की सेवा का पर्याय माना जाता था। लेकिन आज मुनाफे की चांदी बटोरने की होड़ वाले अग्रणी पेशों में चिकित्सा व्यवसाय की गिनती होने लगी है। धन बटोरने की अंधी हवस में मानवता के तार-तार होने की इस व्यवसाय से जुड़ी खबरें आये दिन सुर्खियां बटोरती रहती हैं। यूं तो आज पैसे की अंतहीन भूख उन तमाम पेशों में नजर आती है जो सेवा-परोपकार व मनुष्यता के कल्याण में अग्रदूत माने जाते रहे हैं। लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं जो इंसानियत के रखवाले माने जाते रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को पूछना पड़ा कि दिल्ली में जिन 51 अस्पतालों को रियायती जमीन दी गई थी और उन्होंने कुछ प्रतिशत गरीबों का इलाज मुफ्त करने का वायदा किया था, वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं?

दरअसल, केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में एक नीतिगत फैसला लिया था, जिसके अंतर्गत दिल्ली में गरीब लोगों के लिये निजी अस्पतालों में एक सीमा तक मुफ्त इलाज की सुविधा मुहैया कराई गई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि अस्पताल निजी हों या सरकारी, वे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिये ही बने होते हैं। इसी के मद्देनजर कई निजी अस्पतालों के निर्माण हेतु रियायती दर पर सरकार भूखंड उपलब्ध कराती है। जिसके चलते निजी अस्पतालों के कुछ दायित्व भी होते हैं। जिसमें निर्धन मरीजों के उपचार हेतु नि:शुल्क उपचार की सुविधा उपलब्ध कराना होता है। यही वजह थी कि साल 2018 में भी, देश की शीर्ष अदालत ने रियायती जमीन हासिल करने वाले अस्पतालों को नसीहत दी थी कि गरीब लोगों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। साथ ही इस मामले में लापरवाही बरताने वालों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करने को कहा था। विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा चेताने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। वहीं दूसरी ओर इस बाबत निगरानी करने वाले सरकारी विभाग भी आंख मूंद कर बैठे रहते हैं।

इस गंभीर मुद्दे की बार-बार अनदेखी किए जाने से खिन्न देश की शीर्ष अदालत ने हाल ही में दिल्ली में रियायती दामों में प्लॉट लेने वाले 51 हॉस्पिटलों को नोटिस भेजकर अपना दायित्व न निभाने वालों को इसकी वजह बताने को कहा गया है। कोर्ट ने चेताया है कि अस्पताल के मालिकों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए! यह विडंबना है कि केंद्र व दिल्ली सरकार इस गंभीर मामले में उदासीन नजर आती हैं। विसंगति देखिए कि जिस दायित्व का निर्वहन सरकारों को करना चाहिए था, उस पर देश के सुप्रीम कोर्ट को आदेश देने पड़ रहे हैं। जो हमारे तंत्र की काहिली को ही उजागर करता है।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के नीतिगत फैसले में इस बात का प्रावधान था कि रियायती कीमत पर जमीन पाने वाले अस्पतालों को आंतरिक रोगी विभाग में न्यूनतम दस प्रतिशत और ओपीडी में पच्चीस प्रतिशत गरीबों का इलाज मुफ्त करना होगा। जिससे जुड़ी जवाबदेही पूरी करने को शीर्ष अदालत ने 2018 में भी चेताया था। लेकिन इसके बावजूद जमीनी हकीकत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। यही वजह है कि पिछले दिनों शीर्ष अदालत ने इन अस्पतालों को नोटिस भिजवाए हैं। साथ ही अवज्ञा करने पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि इन निजी अस्पतालों में गरीबों को मुफ्त इलाज मिल सके, पहली जवाबदेही सरकार की बनती है। यदि सरकार की नियामक एजेंसियां सख्ती दिखाती तो क्या मजाल थी कि निजी अस्पताल अपने वायदे से मुकर जाते।

बाकायदा, ऐसे मामलों में उदासीनता दिखाने वाले सरकारी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए और लापरवाही दिखाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। निस्संदेह, इन हालातों के चलते ही आम जनता का तंत्र से भरोसा उठता है। यदि सरकारी तंत्र निगरानी व जवाबदेही तय करने में चुस्ती दिखाता तो कई गरीब मरीजों का जीवन बचाया जा सकता था। आज जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं इतनी महंगी हो चुकी हैं कि हर साल लाखों लोग खर्चीले इलाज कराने के चलते गरीबी के दलदल में धंस जाते हैं।

Hariram Chaurasia

हरीराम चौरसिया, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में 34 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव है। वे देश के प्रतिष्ठित अखबार 'दैनिक जागरण' सहित अन्य कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस के साथ कार्य कर चुके हैं और निष्पक्ष एवं तथ्यपरक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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