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जय श्री राम’ से ‘जय मां काली’ तक… बंगाल चुनाव से पहले BJP ने बदला नारा, क्या रणनीति में भी होगा कोई बदलाव?

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले BJP ने जय श्री राम की जगह जय मां काली का नारा प्रमुखता से लगाया है. पीएम मोदी के इस मैसेज को सांस्कृतिक जुड़ाव और महिला वोटरों तक भाजपा की रणनीतिक पहुंच को बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है.

नई दिल्ली। बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने मैसेजिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव किया है. लंबे समय तक ‘जय श्री राम’ के नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरने वाली भाजपा अब ‘जय मां काली’ और ‘जय मां दुर्गा’ जैसे नारों पर जोर देती दिख रही है.

पीएम मोदी द्वारा हालिया जनसभाओं और संदेशों में ‘जय मां काली’ का आह्वान इस बदलाव को और स्पष्ट करता है. ये परिवर्तन केवल शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है, जिसका मकसद बंगाल की सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनाओं से गहरा जुड़ाव स्थापित करना है.

• बाहरी छवि से स्थानीय पहचान की ओर बढ़ना चाहती है BJP

बंगाल की राजनीति में BJP को लंबे समय तक बाहरी पार्टी के तौर पर प्रचारित किया गया हौ. ‘जय श्री राम’ का नारा उत्तर और पश्चिम भारत में गूंजता रहा है, लेकिन बंगाल में इसे अक्सर राजनीतिक टकराव का प्रतीक माना गया है, ऐसे में भाजपा द्वारा ‘जय मां काली’ का प्रयोग बंगाल की सांस्कृतिक विरासत से खुद को जोड़ने जैसा है.

मां काली और मां दुर्गा बंगाल के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं. दुर्गा पूजा और काली पूजा न केवल धार्मिक आयोजन हैं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक और भावनात्मक एकजुटता के प्रतीक भी हैं. BJP की नई रणनीति इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से खुद को स्थानीय भावनाओं से जोड़ने की कोशिश करती दिखती है.

• महिला वोटर्स निभा सकती हैं निर्णायक भूमिका

भाजपा की नेता और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कोलकाता में महिला मोर्चा के कार्यक्रम में महिलाओं से अपने भीतर की दुर्गा शक्ति को जगाने की अपील की. यह संदेश केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे महिला सशक्तिकरण के व्यापक राजनीतिक विमर्श से जोड़ा गया. हाल के वर्षों में महिलाओं की बढ़ती चुनावी भागीदारी ने सभी दलों को इस वर्ग पर विशेष ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है.

बिहार, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों की तरह बंगाल में भी महिला वोटर निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं. देवी काली और दुर्गा के प्रतीकों के माध्यम से BJP महिलाओं में शक्ति, आत्मसम्मान और सुरक्षा की भावना को संबोधित करने की कोशिश कर रही है.

बंगाल में हाल में सामने आई कुछ दर्दनाक घटनाओं जैसे आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल रेप मर्डर केस और दुर्गापुर मेडिकल कॉलेज गैंगरेप मामले ने महिला सुरक्षा को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना दिया है. इन घटनाओं का जिक्र करते हुए BJP नेताओं ने शक्ति और न्याय की आवश्यकता पर जोर दिया

इस तरह भाजपा द्वारा धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल केवल आस्था तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे सामाजिक न्याय और महिला सुरक्षा के व्यापक नजरिए से जोड़ा गया. ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा ने इससे अपने संदेश को धार्मिक पहचान से आगे ले जाकर सामाजिक एजेंडा से जोड़ना चाहा है. बता दें, ‘जय मां काली’ और ‘जय मां दुर्गा’ के नारे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी गूंजे थे. ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारों के साथ देवी स्वरूप राष्ट्र की कल्पना विशेष रूप से बंगाल से ही उभरी थी.

पूर्व सांसद और BJP नेता स्वपन दासगुप्ता का कहना है कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान राष्ट्रवाद को मातृशक्ति के प्रतीक से जोड़ा गया था. समय के साथ ‘भारत माता’ का विचार हिंदू राष्ट्रवादी विमर्श का हिस्सा बन गया. BJP की वर्तमान रणनीति को इसी ऐतिहासिक परंपरा की निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है, जहां सांस्कृतिक प्रतीकों को समकालीन राजनीति से जोड़ा जा रहा है.

• रणनीतिक लचीलापन या फिर भाजपा का वैचारिक बदलाव

‘जय श्री राम’ से ‘जय मां काली’ की ओर भाजपा का ये झुकाव वैचारिक बदलाव से ज्यादा रणनीतिक लचीलेपन को दर्शाता है. पार्टी यह स्वीकार करती दिख रही है कि राजनीतिक पहचान केवल विचारधारा से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव से भी बनती है.

बंगाल में जहां देवी पूजा सामाजिक जीवन के केंद्र में है, वहां स्थानीय देवी-देवताओं का आह्वान पार्टी को जमीनी स्तर पर स्वीकार्यता दिला सकता है. यह संदेश भी दिया जा रहा है कि BJP केवल एक अखिल भारतीय पार्टी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भावनाओं को समझने और सम्मान देने वाली पार्टी है.

• क्या भाजपा के लिए इससे बदलेगा चुनावी समीकरण?

अब ये देखना बाकी है कि नारे का यह बदलाव वोटों की गिनती में कितना परिवर्तन लाता है. बंगाल की राजनीति ऐतिहासिक रूप से वैचारिक रूप से सजग और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील रही है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) पहले से ही बंगाली अस्मिता और स्थानीय संस्कृति को अपनी राजनीति के केंद्र में रखती है. ऐसे में BJP की कोशिश है कि वह सांस्कृतिक जमीन पर प्रतिद्वंद्विता करे और खुद को बाहरी के बजाय स्थानीय सहयोगी के रूप में स्थापित करे. लेकिन चुनौती केवल प्रतीकों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. असली कसौटी यह होगी कि क्या ये सांस्कृतिक अपील ठोस नीतिगत कदमों और जमीनी मुद्दों के समाधान में भी बदलती है या नहीं.

• क्या बंगाल में भाजपा के लिए खुलेंगे नए दरवाजे

‘जय मां काली’ का नारा चुनावी रणनीति का हिस्सा जरूर है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी इसे किस तरह व्यवहारिक नीतियों और कार्यक्रमों से जोड़ती है. अगर यह संदेश केवल प्रतीकात्मक स्तर पर रह जाता है, तो इसका प्रभाव सीमित हो सकता है. लेकिन यदि इसे महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा और सांस्कृतिक सम्मान की पहल से जोड़ा गया तो यह भाजपा के लिए बंगाल में नए दरवाजे खोल सकती है

Hariram Chaurasia

हरीराम चौरसिया, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में 34 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव है। वे देश के प्रतिष्ठित अखबार 'दैनिक जागरण' सहित अन्य कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस के साथ कार्य कर चुके हैं और निष्पक्ष एवं तथ्यपरक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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