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सेकेंडरी स्टील सेक्टर के लिए उभरता बड़ा अवसर : Induction Furnace रूट से प्राइमरी क्वालिटी स्टील बनाने की दिशा में नई पहल

वैश्विक स्तर पर स्टील उद्योग स्वच्छ, ऊर्जा-कुशल, लचीले और लागत-प्रभावी उत्पादन मार्गों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में यदि कोई तकनीक मौजूदा SECONDARY STEEL इंफ्रास्ट्रक्चर का आर्थिक उपयोग करते हुए स्टील की गुणवत्ता में सुधार करती है, तो इससे उद्योग को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

फोटो: दिनेश कुमार सरावगी, स्टील उद्योग सलाहकार


रायपुर । भारत आज विश्व के प्रमुख स्टील उत्पादक देशों में शामिल है। इस उपलब्धि में सेकेंडरी स्टील सेक्टर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से Direct Reduced Iron/स्पंज आयरन और Induction Furnace आधारित स्टील उत्पादन ने देश के औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचा निर्माण में बड़ा योगदान दिया है।

भारत में नॉन-कोकिंग कोयले की पर्याप्त उपलब्धता के कारण कोल-बेस्ड डीआरआई का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसी डीआरआई का Induction Furnace में स्टील निर्माण के लिए होता है। इस मार्ग से बनने वाले स्टील को सामान्यतः सेकेंडरी स्टील की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि, पारंपरिक इंडक्शन फर्नेस रूट की सबसे बड़ी चुनौती उच्च गुणवत्ता वाले प्राइमरी ग्रेड स्टील का लगातार उत्पादन करना रही है। इस रूट से बनने वाले स्टील में फॉस्फोरस और सल्फर की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक रहने की समस्या देखी जाती है। इसी कारण महत्वपूर्ण और उच्च प्रदर्शन वाले उपयोगों में ऐसे स्टील को लेकर गुणवत्ता संबंधी आशंकाएं बनी रहती हैं। इसी वजह से बड़ी स्टील कंपनियां, प्रीमियम उपभोक्ता, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर, सरकारी परियोजनाएं और गुणवत्ता के प्रति सजग ग्राहक सामान्यतः PRIMARY STEEL को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें फॉस्फोरस और सल्फर का स्तर कम तथा मेटलर्जिकल गुणवत्ता अधिक स्थिर होती है।

स्टील उद्योग सलाहकार एवं कंसल्टेंट दिनेश कुमार सरावगी लंबे समय से इस दिशा में अध्ययन और शोध कर रहे हैं कि SECONDARY STEEL को व्यावसायिक रूप से व्यवहारिक और किफायती तरीके से प्राइमरी क्वालिटी स्टील में कैसे बदला जा सकता है। उनके अनुसार इस कार्य का मुख्य उद्देश्य स्पंज आयरन का बेहतर उपयोग, स्टील गुणवत्ता में सुधार, उत्पादन लागत में कमी, प्लांटों की लाभप्रदता में वृद्धि, मौजूदा संसाधनों का उपयोग, न्यूनतम अतिरिक्त पूंजी निवेश और वैल्यू एडेड स्टील ग्रेड के उत्पादन की क्षमता विकसित करना है। हाल ही में इस दिशा में एक उत्साहजनक नई स्टीलमेकिंग अवधारणा सामने आई है। इस नई प्रक्रिया के माध्यम से पारंपरिक इंडक्शन फर्नेस आधारित सेकेंडरी स्टील को उचित लागत पर प्राइमरी क्वालिटी स्टील में अपग्रेड करने की संभावना बन रही है।

सरावगी ने बताया कि पिछले कई दिनों से वे इस तकनीकी अवधारणा के अध्ययन और परीक्षण कार्य में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। कुछ प्लांटों में प्रारंभिक स्तर पर इसका क्रियान्वयन भी शुरू हो चुका है। अब तक प्राप्त परिणामों से तकनीकी व्यवहार्यता और व्यावसायिक उपयोगिता को लेकर मजबूत विश्वास बना है। इस विकास की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मध्यम और छोटे स्टील उत्पादकों के लिए बड़ा अवसर साबित हो सकता है, जिनके पास पहले से Direct Reduced Iron और Induction Furnace आधारित बुनियादी ढांचा मौजूद है। यदि यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक आगे बढ़ती है, तो यह इंडक्शन फर्नेस और सेकेंडरी स्टील सेक्टर के लिए गेम चेंजर तकनीकी प्रगति साबित हो सकती है।

वैश्विक स्तर पर स्टील उद्योग स्वच्छ, ऊर्जा-कुशल, लचीले और लागत-प्रभावी उत्पादन मार्गों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में यदि कोई तकनीक मौजूदा SECONDARY STEEL इंफ्रास्ट्रक्चर का आर्थिक उपयोग करते हुए स्टील की गुणवत्ता में सुधार करती है, तो इससे उद्योग को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है। फिलहाल यह कार्य विकास के चरण में है और आगे औद्योगिक परीक्षण, परिचालन अनुकूलन तथा तकनीकी सत्यापन की प्रक्रिया जारी है। फिर भी प्रारंभिक परिणामों और उद्योग जगत की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने इस संभावना को मजबूत किया है कि आने वाले समय में यह अवधारणा सेकेंडरी स्टील उद्योग की दिशा बदल सकती है।

Hariram Chaurasia

हरीराम चौरसिया, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में 34 से अधिक वर्षों का समृद्ध अनुभव है। वे देश के प्रतिष्ठित अखबार 'दैनिक जागरण' सहित अन्य कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस के साथ कार्य कर चुके हैं और निष्पक्ष एवं तथ्यपरक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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